बुधवार, मई 13, 2009

राम के आडवाणी या आडवाणी के राम!
कुछ समय पहले तक ये बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी कि राजनेताओं के कुर्सी प्रेम की इस कहानी की शुरुआत कहाँ से की जाये। पहले भाजपा से शुरू करून जिसका समर्थन करना वर्त्तमान परिस्थितियों को देखते हुए फायदेमंद हो सकता है या अपने गुजरे हुए समय यानि त्रेतायुग से जहाँ पहुंचते ही महर्षि वाल्मीकि और हनुमान जी के दर्शन होते हैं. वैसे इन तीनों में एक समानता है कि राम की बात तीनों ही करते हैं. अब शुरुआत तो कहीं न कहीं से करनी ही है, तो चलिए राम का नाम ले कर शुरू करते हैं राम मंदिर के पुनर्निमाण का बीड़ा उठाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और पीऍम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी से।

हम सभी इस बात से परिचित हैं कि श्रीराम तो अवध के राजा थे ही और सनातन धर्म के अनुसार उन्हें ईश्वरीय अवतार माना जाता है, तो पूजे जाने के योग्य तो वे हैं हीं। अब आप पूछेंगे कि आडवाणी से राम का क्या मतलब? लेकिन आडवाणी को राम से तो मतलब है ही. आडवाणी जी शुरुआत से ही राम नाम का जप करते रहे हैं. उनके इस नाम जप ने भी अपना असर दिखाया और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए रथ यात्रा के रूप में आडवाणी का अपना सिक्का जमाने का प्रयास भी सफल रहा. " सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर यहीं बनायेंगे, हम मंदिर भव्य बनायेंगे" के नारे के साथ कारसेवक बाबरी मस्जिद/मंदिर के विवादित ढांचे पर चढ़ गए. उनमें राम लला के नाम का उन्माद देख कर ऐसा लगता था कि सबके ऊपर साक्षात् काली विराज रही हों, पर बुद्धि तो सबकी कालिदास वाली हो गयी थी. इसका प्रमाण ऐसे मिलता है कि ढांचे के गुम्बद पर चढ़ कर लोगों ने उसे ही तोड़ना शुरू कर दिया. इस क्रम में सैकडों कारसेवक जख्मी हो गए और उनमें से कई इस जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो इस मृत्युलोक से छूट कर सीधे ब्रह्मलोक पहुँच गए.

वैसे राम मंदिर निर्माण और वहां विधिवत पूजा-पाठ का मुद्दा तो कांग्रेस का होना चाहिए था। ऐसा इसलिए क्योंकि इस विवादस्पद मंदिर/मस्जिद का ताला खुलवाने का काम तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने किया था और सभी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि राजीव गाँधी का नाता भारतीय जनता पार्टी से न हो कर कांग्रेस से था। लेकिन अफ़सोस, सेक्युलरिज्म को जिन्दा रखने वाली और अल्पसंख्यकों की मसीहा कांग्रेस इस मुद्दे को कैसे अपना सकती थी.

बाबरी मस्जिद तोड़ना आडवाणी के जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना की तरह है। इसका प्रमाण आडवाणी द्वारा लिब्राहन आयोग के सामने दिए गए उत्तर में मिलता है। आयोग के सामने आडवाणी ने इसे एक दुर्घटना माना और इसे अत्यंत दुखद करार दिया. इसमें भी आडवाणी पर राम नाम का प्रभाव साफ देखा जा सकता है. शायद आडवाणी उस समय मानसिक संप्रेषण शक्ति का प्रयोग कर कारसेवकों के मन में एक ही बात डालने की कोशिश कर रहे होंगे कि "(चढ़ जा बेटा सूली पर) भला करेंगे राम".

इस यात्रा के बाद ही भाजपा का "मत से थोड़ा आगे बढ़ कर बहुमत पाने का सपना" साकार होता नज़र आने लगा। भाजपा प्रत्याशी सड़क से संसद तक पहुँच गए। जहाँ अब तक संसद में भाजपा के 2 सदस्य हुआ करते थे, अब उनकी संख्या बढ़ कर ८० से ज्यादा हो गयी.

कहते हैं कि "राम से बड़ा राम का नाम"। और यह बात आडवाणी जी को शायद बहुत पहले समझ में आ गयी थी। लोकसभा चुनावों में सीटों की संख्या में बढोत्तरी होते देख आडवाणी का राम प्रेम तो कम होता दिखा लेकिन नाम प्रेम और बढ़ गया. श्रीराम के आशीर्वाद से २७ दलों के गठबंधन के साथ ही सही लेकिन भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में सरकार का गठन तो हो ही गया. फिर क्या बचा था -

अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।

खैर, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ५ सालों तक चलती रही और आडवाणी जी का राम पर विश्वास अडिग हो गया। देश भी राम भरोसे चलता रहा। इसमें भी आडवाणी का राम पर विश्वास दिखाई देता है.

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो कर सोए।
अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होए।

लेकिन साल २००४ के लोकसभा चुनावों में सत्ता तो भाजपा के हाथ से निकल ही गयी। अटल जी ने तो संन्यास ले कर अपना दमन बचने की कोशिश की या कुर्सी उन्हें मजबूरी में छोड़नी पड़ी और अपने पुराने जनसंघी साथी और मित्र आडवाणी जी के लिए जगह तो खाली करनी ही थी। खैर, अभी भी सबकुछ राम भरोसे ही है.

२००९ के इन लोकसभा चुनावों में भी आडवाणी ने एक बार फिर राम नाम का अलाप करना शुरू कर दिया और इस बार तो उनका प्रमुख निशाना बनी देश की युवा पीढ़ी। कर्नाटक की भाजपा सरकार ने तो अपने राज्य के महाविद्यालयों में छुट्टी दे दी कॉलेज स्टूडेंट्स को आडवाणी जी के चुनाव सभाओं तक बाइज्जत पहुंचाने की जिम्मेदारी कॉलेज शिक्षकों और प्रिंसिपल को सौंप दिया गया। इस तरह के माहौल में विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र दोनों ही दुविधा में पड़े दिखाई दिए. कॉलेज प्रशासन को राज्य सरकार को जवाव देना था और अपने यहाँ पढ़ने आये छात्रों के प्रति भी उनकी जवावदेही बनती थी.

अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोउ काम।
सांचे से तो जग (आडवाणी) नहीं, झूठे मिलै न राम।

इस घटना की स्टूडेंट्स के बीच मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। अब कॉलेज के विद्यार्थियों का खून तो गर्म होता ही है। उन्होंने खुल कर इस घटना पर अपनी नाराजगी दर्ज की और कई कॉलेज प्राध्यापकों ने भी दबी ज़बान से आडवाणी जी की भर्त्सना की. राम, राम, राम, राम! वैसे कर्नाटक सरकार की इस मुहिम का असर कितना सकारात्मक साबित होता है, अभी तो ये राम ही जाने लेकिन १६ मई को तो जनता जान ही जायेगी!

आज आडवाणी जब फिर से राम नाम का अलाप कर रहे हैं तो हमारे समाज के भिन्न-भिन्न वर्ग के लोग कई तरह के सवाल करते नज़र आ रहे हैं -

क्या कलयुग में श्रीराम सचमुच इतने कमज़ोर हो गए हैं कि उन्हें अपना मंदिर बनवाने के लिए आडवाणी जी पर आश्रित रहना पड़ रहा है?

क्या बहुसंख्यकों को अपने राम का ध्यान नहीं रहा?

क्या कारसेवकों का प्रयास, उनकी कुर्बानियां व्यर्थ हो जायेंगी?

क्या कारसेवकों की लाश पर राजनीति करने वालों को दंड नहीं मिलेगा?

क्या बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं से खेलने वाले राजनेताओं ने हमारी सहिष्णुता, हमारी सहनशक्ति को हमारी कमजोरी समझ ली है?

क्या अयोध्या में रामलला का मंदिर बनाने का सपना अधूरा ही रह जायेगा?

वैसे इस बुढ़ापे में बेचारे आडवाणी जी को कम कष्ट नहीं है। एक तो प्रधानमंत्री बनाने का अधूरा ख्वाब उन्हें रह-रह कर सताते रहता है, साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में उभरते हुए नए नाम नरेन्द्र मोदी ने भी उनकी रातों की नींद उड़ा दी है.

अब भाजपा में यह प्रश्न उठने लगा है कि आडवाणी के बाद पीम इन वेटिंग कौन होगा? तो पार्टी में कई नाम शुष्मा स्वराज, राजनाथ सिंह जैसे कई और नाम उभर कर सामने आये। लेकिन गुजरात की जनता की आवाज भी राम तो सुन ही रहे थे, सो वे अरुण शौरी की ज़बान से बोल पड़े और नरेन्द्र मोदी के नाम का भूत फिर से आडवाणी जी के सामने आ कर खड़ा हो गया. वैसे भाजपा में अब ऐसा व्यक्तित्व कहाँ रह गया है जिसे पार्टी का सपोर्ट न मिलने के बावजूद और पार्टी के दिग्गजों द्वारा विरोध किये जाने के बाद भी गुजरात की जनता ने अपना मुख्यमंत्री चुना. अब गुजरात में जौहरियों की क्या कमी और हीरे को तो जौहरी ही परख सकते हैं. भाजपा अकारण ही परेशान हो रही थी।

कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढें बन माहीं।
वैसे घट-घट राम (नरेन्द्र मोदी) हैं, दुनिया देखहिं नाहीं।

अब ८१ वर्ष की उमर वाले आडवाणी जी के दिल पर इतना बोझ डालना भी ठीक नहीं है. राम के नाम से तो कभी डाकू रहे वाल्मीकि का भी उद्धार हो गया. राम के नाम से कबीर हद से अनहद चले गए. महात्मा गाँधी भी राम का नाम लेते हुए मोक्ष पा गए. तो क्या आडवाणी जी को राम नाम लेने से देव स्थान भारतवर्ष के प्रधान मंत्री की तुच्छ कुर्सी भी नहीं मिल सकती!

3 टिप्‍पणियां:

Sundip Kumar Singh ने कहा…

बहुत सटीक तस्वीर दिखाई है आपने....राम नाम की रट लगाये कब अडवानी जी पिछली पंक्ति से अगली पंक्ति में आ खड़े हुए पता ही नहीं चला. इस दौरान विरोधी दलों में भी नई पीढी ने कमान संभाल ली और अब सत्ता के लिए दावेदारी के कगार पर खड़े दिख रहे हैं. सबकी चुनावी टेक्निक भी काफी बदल गई. लेकिन अपने अडवाणी जी के दल में आज भी राम नाम का फायदा इतना ज्यादा दिखाई देता है कि उसे खुद से चिपका कर रखने में ही भलाई दिखाई देती है सभी को...राम नाम की माया ऐसी है कि अभी आने वाले कई दशकों में भी इससे कोई पीछा छुडाने की नहीं सोचेगा...

अक्षत विचार ने कहा…

अरे महाराज आप तो शुरु में कह रहे थे कि राजनेताओं के कुर्सी प्रेम की बात परंतु सिर्फ भाजपा पर ही क्यों अटक गये, क्यों लगे वहीं गोल-गोल घूमने, कहीं ऐसा तो नहीं कि एक ही राजनीतिक दल नजर आया जरा आगे भी बढ़िये। परंतु इसमें आपका दोष नहीं आखिर दुनिया गोल है जहां से चलते हैं वहीं दोबारा वहीं पंहुच जाते हैं

कुमार स्वस्ति प्रिय ने कहा…

प्रिय प्रदीप जी,

"राम के आडवाणी या आडवाणी के राम" शीर्षक लेख पर आपके विचार को पढ़ कर अच्छा लगा. कम-से-कम कोई तो है मेरी बातें सुनने वाला. वैसे आडवाणी जी से मेरा जुडाव बहुत पुराना है. राम मंदिर निर्माण के मसले पर जब ये महानुभाव रथ यात्रा कर रहे थे तब मैंने भी उनके उनके कारसेवकों को भोजन पहुँचाने और मंदिर में इस्तेमाल की जाने वाली ईंटों को लेकर फंड जमा करने का काम किया था. लेकिन आडवाणी जी ने बहुसंख्यकों की भावनाओं का जितना ख्याल रखा है ये तो आप भी जानते हैं. राम का नाम बेच कर सत्ता पाने वाले इन महानुभाव के प्रति मेरे ये भाव बहुत पहले से हैं जिनकी चर्चा मैंने इतने दिनों बाद की है.

मेरे लेख पर आपके विचार जैसे इस बार जानने को मिले, वैसे ही आपका साथ आगे भी मिलता रहे ऐसी कामना है.
कमेन्ट के लिए शुक्रिया!